DNA ANALYSIS: राम मंदिर पर फिर शुरू हुई नफरत फैलाने की साजिश

News Nation

नई दिल्ली: बुधवार को 500 वर्षों के इतंजार के बाद अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन संपन्न हुआ. इन 500 वर्षों में देश में 25 पीढ़ियां आईं और चली गईं. जिन लोगों ने भूमि पूजन की तस्वीरें देखीं उन्होंने भी शायद ये कल्पना नहीं की होगी कि वो अपने जीवन काल में ये सपना पूरा होते हुए देख पाएंगे. इतने वर्षों के बाद देश के हिंदुओं को ये मौका मिला कि वो खुशी और आनंद के साथ घी के दिए जला पाएं, इन दियों की लौ बुझी भी नहीं थी और इसी राम मंदिर का विरोध शुरू हो गया. देश के बहुसंख्यक हिंदुओं को लगता है कि भगवान राम का वनवास असल में अब समाप्त हुआ है. इसलिए 5 अगस्त को पूरे देश में दीवाली जैसा माहौल था. लेकिन क्या आपको पता है कि राम मंदिर के भूमि पूजन को 24 घंटे भी नहीं बीते और हमारे ही देश के एक वर्ग ने इस पर नफरत फैलाने वाली राजनीति शुरू कर दी है.

देश के कुछ मुट्ठी भर मुसलमानों को लग रहा है कि राम मंदिर का भूमि पूजन हो जाने से भारत की धर्म निरपेक्षता खतरे में पड़ गई है और सेक्युलरिज्म की हत्या हो गई है. इतना ही नहीं इस वर्ग के कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि वहां बाबरी मस्जिद थी, बाबरी मस्जिद है और बाबरी मस्जिद रहेगी. तो कुछ लोगों का कहना है कि बुधवार को प्रधानमंत्री ने जो बाते कहीं वो इतिहास के खिलाफ हैं. कुछ लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि इतिहास फिर से दोहराया जाएगा और राम मंदिर को तोड़कर फिर से मस्जिद बनाई जाएगी.

इस तरह के बयान देने वालों में समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर रहमान बर्क, वरिष्ठ वकील जफरयाब जिलानी, ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष साजिद रशीदी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अधिकारी शामिल हैं. 

आखिर जिस देश में चर्च का निर्माण हो सकता है, गुरुद्वारा बनाया जा सकता है, मस्जिद बनाई जा सकती है उस देश में कुछ लोगों को सिर्फ मंदिर के निर्माण से परेशानी क्यों है और इसकी जड़ों में जो नकली धर्म निरपेक्षता है उसके बीज किसने बोए थे?

ये वो लोग हैं जो आजादी के बाद 70 साल तक पहले संविधान की दुआई देते रहे, लोकतंत्र की दुहाई देते रहे, धर्म निपेक्षता की दुहाई देते रहे लेकिन जब लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से इस विवाद का निपटारा सुप्रीम कोर्ट में हो गया तो यही लोग अब संविधान को और सुप्रीम कोर्ट को भी मानने से इनकार कर रहे हैं. आज हम ऐसे कट्टरपंथी और असहनशील लोगों को तथ्यों के जरिए सच्चाई का आईना दिखाएंगे और बताएंगे कि ऐसी असहनशीलता की नए भारत में कोई जगह नहीं है.

संविधान का अपमान कर रहे कुछ लोग
ये वो लोग हैं जो सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने से पहले कहते थे कि वो फैसले का सम्मान करेंगे क्योंकि इनकी भारत के सुप्रीम कोर्ट और संविधान में गहरी आस्था है. लेकिन आज इन्हीं लोगों को लग रहा है कि सुप्रीम कोर्ट सरकार के दबाव में फैसले देता है और राम मंदिर जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संविधान को तोड़ने का काम किया है. यानी अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला इनके मन मुताबिक आता है तो देश का लोकतंत्र और संविधान सलामत रहता है लेकिन अगर फैसला इनकी इच्छा के खिलाफ आता है तो सुप्रीम कोर्ट और संविधान पर सवाल उठने लगते हैं. 5 महीने पहले तक जो लोग दिल्ली के शाहीन बाग में संविधान की कॉपियां हाथ में लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे वही लोग आज संविधान का भी अपमान कर रहे हैं. उस संविधान का जिसकी मूल प्रति में लंका विजय के बाद सीता और लक्ष्मण को साथ लेकर अयोध्या लौटते भगवान श्रीराम का चित्रण किया गया है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को बर्खास्त करने की मांग
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के खिलाफ आज दिल्ली में शिकायत दर्ज हुई है. दिल्ली पुलिस को दी गई शिकायत में इस संगठन पर आईपीसी की धाराएं 153 ए, 153 बी, 295 ए, धारा 298, 504, 505 के तहत सांप्रदायिक नफरत फैलाने, हिंसा और दंगों के लिए उकसाने और सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के लिए मामला दर्ज करने को कहा गया है. राम मंदिर के भूमि पूजन से एक दिन पहले ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक ट्वीट किया था, जिसमें ये कहा गया था कि बाबरी मस्जिद थी और हमेशा रहेगी. इसमें टर्की के हाया सोफिया का उदाहरण दिया गया था और ये कहा गया था कि स्थितियां एक जैसी नहीं होती, इसलिए दिल तोड़ने की जरूरत नहीं है.

हालांकि बाद में इस ट्वीट को डिलीट कर दिया गया था. लेकिन इससे इन संगठनों की सोच डिलीट नहीं हुई और इनकी सोच सबको पता चल गई कि ये लोग ना सुप्रीम कोर्ट को मानते हैं और ना ही संविधान को मानते हैं. इसलिए देश का गुस्सा भी ऐसे संगठन के प्रति दिख रहा है. अब पूरे देश में मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को बर्खास्त करने की मांग हो रही है.

मुस्लिम समाज को भड़काते हैं ये लोग
राम मंदिर का विरोध करने वाले ये वही लोग हैं जो मुस्लिम समाज को भड़काते हैं और उन्हें और कट्टरपंथी बनाने की कोशिश करते हैं. ऐसे लोग भारतीय परंपराओं और सनातन संस्कृति का भी विरोध करते हैं. योग जैसी भारतीय परंपराएं इन्हें पसंद नहीं, जिसे दुनिया मानती है. यही लोग सलमान रश्दी और तसलीमा नसरीन जैसे लेखक और लेखिकाओं का विरोध करते हैं, उन्हें भारत में आने या रहने नहीं देना चाहते. क्योंकि ऐसे लेखक कट्टरपंथी विचारधारा के खिलाफ बोलते और लिखते हैं.

जाने माने लेखक सलमान रश्दी ने जब The Satanic Verses नाम का उपन्यास लिखा था तो उनके खिलाफ फतवे जारी हो गए थे. कुछ वर्ष पहले सलमान रश्दी को जयपुर लिट्रेचर फेस्टिवल में आने पर कट्टरपंथियों ने विरोध किया था जिसके बाद उन्होंने जान का खतरा बताते हुए भारत का दौरा रद्द कर दिया था और बाद में उन्होंने इस कार्यक्रम को वीडियो कॉन्फ्रेसिंग के जरिए संबोधित किया था.

देश का माहौल खराब करने की कोशिश
नफरत फैलाने वाले ये वो लोग हैं जो खुद को भारत के मुसलमानों का असली रहनुमा मानते हैं. लेकिन ये सच नहीं है क्योंकि देश के ज्यादातर मुसलमान आज भी शांति चाहते हैं. इन्हें इस विवाद से कोई फर्क नहीं पड़ता और ये लोग सौहार्द के साथ रहना चाहते हैं. लेकिन इन्हें कुछ लोग भड़का रहे हैं और सौहार्द के मंदिर को विवाद का विषय बनाकर माहौल खराब करना चाहते हैं.

अब आपको सोचना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट, संविधान और सेक्युलरिज्म के नाम पर अन्याय इन लोगों के साथ हो रहा है या फिर असली अन्याय एक विशेष वर्ग के तुष्टिकरण के नाम पर भारत की बहुसंख्यक आबादी के साथ किया गया? अब आप सोचिए कि इसकी शुरुआत कहां से होती है और इसके बीज किसने बोए थे? आजादी से पहले ही ये साफ होने लगा था कि कुछ लोग धर्म के नाम पर इस देश को बांट देना चाहते हैं, और 15 अगस्त 1947 को ऐसा हो भी गया, जब देश के दो टुकड़े हो गए. लेकिन हजारों वर्षों की सभ्यता और संस्कृति वाला इतना बड़ा देश एक झटके में कैसे बंट गया? इसमें बड़ी गलती उन लोगों की नहीं थी जो मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बनाना चाहते थे बल्कि गलती उन लोगों की थी जिन्होंने धर्म निरपेक्षता के नाम पर ये होने दिया.

सोमनाथ मंदिर की कहानी
अब आपको एक कहानी सुनाते हैं. ये कहानी 70 वर्ष पुरानी है. ये कहानी कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकों के पन्नों में सिर्फ इसलिए खोकर रह गई क्योंकि इसमें नकली धर्म निरपेक्षता के बीज बोने वालों को पर्दाफाश किया गया था. भारत की आजादी को 2 वर्ष बीत चुके थे यानी ये 1950 का वर्ष था. उस समय देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की कैबिनेट में एक मंत्री हुआ करते थे. जिनका नाम था कन्हैया लाल मानेक लाल मुंशी. जिन्हें लोग केएम मुंशी के नाम से जानते हैं. केएम मुंशी चाहते थे कि उस समय के सौराष्ट्र यानी आज के गुजरात में जो सोमनाथ मंदिर है उसका फिर से निर्माण कराया जाए, क्योंकि बाहर से आए आक्रमणकारियों ने सोमनाथ मंदिर को पूरी तरह से नष्ट कर दिया था. माना जाता है कि सोमनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से पहला ज्योतिर्लिंग है. ये भारत की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता संस्कृति और आस्था का प्रतीक है. लेकिन पहले 11 शताब्दी में मुसलमान आक्रमणकारी महमूद गजनी ने इस मंदिर पर कई बार आक्रमण किए, इसका शिवलिंग तोड़ दिया और सारा खजाना लूट लिया. इसके बाद 13वीं शताब्दी में आक्रमणकारी अलाउद्दीन खिलजी ने भी इस मंदिर के साथ यही किया. 

सोमनाथ मंदिर के निर्माण के पक्ष में नहीं थे नेहरू
जब देश आजाद हो गया तो केएम मुंशी और भारत के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल ने तय किया कि मंदिर का फिर से निर्माण कराया जाएगा. केएम मुंशी समेत कांग्रेस के कई बड़े नेता इसकी अनुमति लेने महात्मा गांधी के पास पहुंचे और महात्मा गांधी ने इसके लिए आशीर्वाद और अनुमति दोनों दे दी. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जवाहर लाल नेहरू सोमनाथ मंदिर के निर्माण के पक्ष में नहीं थे.

इसे लेकर जब केएम मुंशी और नेहरू के बीच बहस हुई तो नेहरू ने कहा कि वो सोमनाथ मंदिर के निर्माण से खुश नहीं हैं क्योंकि इससे हिंदुत्व का फिर से उदय हो जाएगा. ये बातें केएम मुंशी ने अपनी पुस्तक पिल्ग्रिमेज टू फ्रीडम (Pilgrimage to Freedom) में लिखी हैं. जिसे नेहरू हिंदुत्व का उदय कह रहे थे उसे केएम मुंशी भारत के लोगों की सामूहिक चेतना का नाम दे रहे थे. यानी आजाद भारत के एक नेता को लगता था कि एक मंदिर के निर्माण से हिंदुत्व का उदय हो जाएगा और देश की अल्पसंख्यक आबादी को निराशा होगी जबकि एक नेता को लगता था कि इसमें हिंदू मुसलमान का सवाल ही नहीं है क्योंकि ये तो सारे भारतीयों की सामूहिक इच्छा का विषय है और इसमें हिंदू और आजादी के बाद भारत को चुनने वाले मुसलमान भी शामिल हैं.

जब सरदार पटेल से नाराज हो गए नेहरू
लेकिन सोमनाथ मंदिर के प्रति जवाहर लाल नेहरू का विरोध यहीं खत्म नहीं होता. वो इस मामले में सरदार पटेल से भी नाराज थे. जब नवंबर 1947 में सरदार पटेल सोमनाथ मंदिर पहुंचे और वहां दिए गए एक भाषण में उन्होंने घोषणा की कि इस मंदिर का निर्माण नए वर्ष से शुरू हो जाएगा तो नेहरू उनसे भी नाराज हो गए. इसके बाद जब भारत के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के लिए बुलाया गया तो नेहरू ने इसका भी पुरजोर विरोध किया. लेकिन डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद फिर भी वहां गए और उन्होंने वहां एक भाषण भी दिया. जिसे देश के सभी अखबारों में तो छापा गया लेकिन कांग्रेस के सभी मुखपत्रों में इस भाषण को कोई जगह नहीं मिली और पंडित नेहरू ने सेक्युलरिज्म के नाम पर अपने ही अखबारों को सेंसर कर दिया.

राम मंदिर पर पाकिस्तान का बयान
आज जवाहर लाल नेहरू या उनका परिवार तो सत्ता में नहीं है लेकिन जो लोग राम मंदिर का विरोध कर रहे हैं उनके बयानों को सुनकर आपको यही कहानी आज भी चरितार्थ होती हुई प्रतीत होगी. यानी 73 वर्षों में सब कुछ बदल गया अगर कुछ नहीं बदला तो वो है नकली धर्म निरपेक्षता और तुष्टिकरण. आपको हैरानी तो होगी लेकिन राम मंदिर पर जो बयान देश के एक विशेष वर्ग के लोग दे रहे है वैसा ही बयान पाकिस्तान ने भी दिया है. पाकिस्तान ने कहा है कि भारत के सुप्रीम कोर्ट का फैसला गलत है और भारत में मुसलमानों को दबाया जा रहा है और अल्पसंख्यकों से उनके धार्मिक स्थलों को छीना जा रहा है. ये कितना बड़ा संयोग है कि 7 दशकों पहले भी भारत को बांटने की पटकथा पाकिस्तान बनाने वालों ने लिखी थी और आज भी देश को बांटने की पटकथा पाकिस्तान लिखता है और उस स्क्रिप्ट को पढ़ने का काम भारत के ही कुछ लोग करते हैं. 

जिन लोगों को आज भारत का लोकतंत्र खतरे में दिखाई दे रहा है ये वो लोग हैं जो असल में धर्म के आधार पर भारत का नक्शा एक बार फिर से बदल देना चाहते हैं. इसलिए आज आपको इन लोगों के एक और वैचारिक पूर्वज के बारे में जानना चाहिए जिससे सारी बातें साफ हो जाएंगी. वर्ष 1947 में भारत तो आजाद हो गया लेकिन तब भी देश में 565 ऐसी रियासतें थीं जिन्हें भारत में रहने, पाकिस्तान के साथ जाने या फिर स्वतंत्र रहने का विकल्प दिया गया था. ऐसी ही एक रियासत थी जूनागढ़. और जूनागढ़ के शासक का नाम था नवाब महाबत खान. जूनागढ़ में बहुसंख्यक आबादी हिंदू थी और इसकी पाकिस्तान से कोई सीमा भी नहीं मिलती. लेकिन फिर भी जूनागढ़ के नवाब ने तय किया कि वो अपनी रिसायत का विलय पाकिस्तान के साथ करेंगे. सरदार पटेल को ये बात पसंद नहीं आई और भारत ने अपनी सेना भेजने की तैयारी कर ली.

इस बीच 20 फरवरी 1948 को जूनागढ़ में एक जनमत संग्रह हुआ. जिसमें 1 लाख 90 हजार 870 लोगों ने हिस्सा लिया. इनमें से सिर्फ 91 लोगों ने पाकिस्तान के साथ विलय के पक्ष में मतदान किया जबकि बाकी सभी लोगों ने भारत के साथ रहने की इच्छा जताई. जब ये सब हो रहा था उससे पहले ही जूनागढ़ के नवाब पाकिस्तान के कराची चले गए और अपने साथ अपनी रियासत की संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा भी ले गए.

उस समय हैदराबाद में भी कुछ ऐसी ही स्थिति थी वहां के नवाब अपना स्वतंत्र राज्य बनाना चाहते थे. इसके लिए हैदराबाद के नवाब मीर उस्मान अली खान ने अपनी एक निजी सेना भी तैयार कर ली थी. इसके बाद भारत ने हैदराबाद में अपनी सेना उतारी और हैदराबाद का विलय भारत में हो गया. हैदराबाद और जूनागढ़ में शासक मुसलमान थे लेकिन बहुसंख्यक आबादी हिंदू थी. फिर भी इन लोगों ने आजाद रहने और पाकिस्तान के साथ जाने का फैसला किया. यही वजह थी सरदार पटेल कश्मीर को लेकर कोई खतरा मोल नहीं लेना चाहते थे. कश्मीर की बहुसंख्यक आबादी मुसलमान थी जबकि शासक हिंदू था और सरदार पटेल ने समय रहते ही कश्मीर का विलय भारत में करा दिया.

अब शुरू हुई पाकिस्तान की ‘नक्शेबाजी’
राम मंदिर के निर्माण की पीड़ा पाकिस्तान को भी हो रही है और पाकिस्तान ने एक नया राजनैतिक नक्शा जारी करते हुए जूनागढ़ और कश्मीर को अपना हिस्सा बता दिया है. कश्मीर पर पाकिस्तान की सोच से तो सब वाकिफ हैं लेकिन जूनागढ़ पर पाकिस्तान का दावा हैरान करने वाला है और विडंबना ये है कि जिस सोमनाथ मंदिर को आक्रमकारियों ने तबाह किया और जिसके निर्माण के विरोध में जवाहर लाल नेहरू भी थे वो मंदिर आजादी से पहले जूनागढ़ रियासत का ही हिस्सा था. यानी इतिहास सिर्फ खुद को दोहराता ही नहीं है बल्कि हमें पुराने अनुभवों से बहुत कुछ सीखने और समझने का अवसर भी देता है.

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