DNA ANALYSIS: उत्तर प्रदेश में ‘आपराधिक सोच’ का ‘एनकाउंटर’ कब?

News Nation

नई दिल्ली: दो दिन पहले देश की राजधानी दिल्ली के पास गाजियाबाद में कुछ लोगों ने एक पत्रकार की गोली मारकर हत्या कर दी थी. इस पत्रकार का नाम है विक्रम जोशी जो अपनी 5 और 8 साल की दो छोटी-छोटी बेटियों के साथ स्कूटी से घर लौट रहे थे. विक्रम जोशी का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने कुछ ऐसे लोगों के खिलाफ पुलिस में शिकायत की थी जो अक्सर उनकी भांजी के साथ छेड़छाड़ करते थे. इसी बात से नाराज इन अपराधियों ने पत्रकार को रास्ते में रोका, उनके साथ मारपीट की और फिर उनके सिर में गोली मार दी.

ये घटना पास लगे CCTV में रिकॉर्ड हो गई. फुटेज में साफ दिखाई दे रहा है कि कैसे अपराधियों ने पहले विक्रम जोशी का रास्ता रोका. फिर उन पर उनकी बेटियों के सामने ही हमला किया, उनकी स्कूटी गिरा दी और मारपीट करने के बाद विक्रम जोशी के सिर में गोली मार दी. जिस समय विक्रम जोशी को गोली मारी गई उस वक्त उनके साथ उनकी दो छोटी बेटियां भी थीं. लेकिन अपराधियों ने उनकी भी परवाह नहीं की. पिता को गोली लगने के बाद उनकी बेटी मदद के लिए उनके पास दौड़ी और राह चलते लोगों से मदद की अपील की. इसके बाद विक्रम जोशी को एक स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां बुधवार सुबह उनकी मौत हो गई.

इस घटना के मुख्य आरोपियों के नाम हैं शाहनूर मंसूरी उर्फ छोटू, रवि और आकाश बिहारी. इनमें से पुलिस ने शाहनूर मंसूरी और रवि को गिरफ्तार कर लिया है जबकि आकाश बिहारी फिलहाल फरार है. कहा जा रहा है कि आकाश बिहारी ने ही सबसे पहले विक्रम जोशी को गोली मारी थी. इसके अलावा पुलिस ने सात और आरोपियों को गिरफ्तार किया है जिनके नाम हैं. मोहित, दलवीर, आकाश, योगेंद्र, अभिषेक सरोज, अभिषेक सिंह और शाकिर.

लेकिन ये खबर सिर्फ आरोपियों की गिरफ्तारी के साथ ही खत्म नहीं होती. क्योंकि इस खबर ने ये सवाल खड़ा कर दिया है कि जिस देश में कुछ ही दिनों बाद रक्षाबंधन का त्योहार आएगा, क्या उस देश में वाकई बहनें और बेटियां सुरक्षित हैं? और अगर नहीं हैं तो क्या सिर्फ रक्षाबंधन के नाम पर रस्म अदायगी करके हम अपने देश की महिलाओं को सुरक्षित होने का झूठा भरोसा दे सकते हैं? इस सवाल का जवाब जानने के लिए आपको इस खबर की जड़ में जाना होगा. ये खबर सिर्फ एक अपराध की खबर नहीं है. हमारे लिए ये एक सामाजिक खबर है क्योंकि ये हमारे देश के असली चरित्र के ऊपर से पर्दा उठाती है.

क्या है पूरा मामला
जिस दिन विक्रम जोशी को गोली मारी गई उससे ठीक चार दिन पहले उन्होंने पुलिस स्टेशन में शाहनूर मंसूरी उर्फ छोटू, रवि और आकाश बिहारी के खिलाफ एक शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत में ये आरोप लगाया गया था कि ये आरोपी विक्रम जोशी की भांजी के साथ आए दिन छेड़छाड़ करते हैं और उसे परेशान करते हैं. 4 दिनों तक पुलिस ने तो इस शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की लेकिन 4 दिनों के बाद ये अपराधी इस शिकायत का बदला लेने जरूर पहुंच गए. इसके बाद जो कुछ हुआ वो हम आपको बता चुके हैं. विक्रम जोशी के परिवार वालों का कहना है कि पुलिस अब भी मुख्य आरोपी को नहीं पकड़ पाई है और पुलिस की नाकामी की वजह से ही विक्रम जोशी की हत्या हुई है. 

बच्ची ने बताई पिता की हत्या की कहानी
8 साल की बच्ची अपने पिता की हत्या की कहानी बता रही है. ये बच्ची उस रात पिता के घायल होने के बाद आसपास के लोगों से मदद मांगती रही लेकिन कोई इसकी मदद के लिए आगे नहीं आया. जबकि विक्रम जोशी की बहन का कहना है कि इन अपराधियों ने पिछले साल होली के मौके पर भी विक्रम जोशी की भांजी के साथ छेड़छाड़ की थी. लेकिन तब भी पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की. और इसका नतीजा ये हुआ कि किसी ने अपना पिता, किसी ने अपना पति तो किसी ने अपना भाई खो दिया.

हमें इस मामले पर रिपोर्टिंग के दौरान ये भी पता चला कि विक्रम जोशी की बहन ने इसी महीने की 16 और 17 तारीख को पुलिस से इन आरोपियों की शिकायत की थी. शिकायत में कहा गया था कि जब आरोपी विक्रम जोशी की भांजी के साथ छेड़छाड़ कर रहे थे. तब विक्रम जोशी का भांजा अपनी बहन को बचाने आगे आया और आरोपियों ने उसके साथ भी मारपीट की. 

क्या कहते हैं महिलाओं से जुड़े अपराध के आंकड़े
पिछले साल नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो यानी NCRB ने महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े कुछ आंकड़े जारी किए थे. ये आंकड़े 2017 के थे, जिनके मुताबिक उस साल देशभर में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 3 लाख 59 हजार 849 मामले दर्ज हुए थे. इनमें सबसे आगे उत्तर प्रदेश है जहां 56 हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए गए थे. 2017 में दर्ज हुए मामलों में 32 हजार 500 रेप के थे. यानी उस साल हर दिन रेप के 90 मामले सामने आए. यानी हर घंटे करीब 4 महिलाओं का रेप हुआ. यानी हर 15 मिनट में रेप की एक घटना हुई.

छेड़छाड़ की घटनाओं को लेकर जब हमने कुछ और आंकड़े निकाले तो पता चला कि करीब 90 प्रतिशत महिलाओं ने कभी ना कभी छेड़छाड़ का सामना किया है और इनमें हर उम्र की महिलाएं शामिल हैं. महिलाओं से छेड़छाड़ करने वालों में 32 प्रतिशत स्कूल और कॉलेज जाने वाले छात्र होते हैं. 35 प्रतिशत असमाजिक तत्व होते हैं और 33 प्रतिशत ऐसे पुरुष होते हैं जिनकी उम्र 45 से 65 के बीच होती है.

देवियों की पूजा करने वाला देश भारत
हमारे देश में रक्षाबंधन जैसे त्यौहार हैं, हमारे देश में देवियों की पूजा होती है. भगवती जागरण होते हैं. नवरात्र के दौरान कन्या पूजन होता है. जिसमें आस-पड़ोस की बच्चियों को घर बुलाकर खाना खिलाया जाता है और उनके पैर छुए जाते हैं. जबकि हमारे ही देश में लोग इन्हीं लड़कियों के साथ रेप करते हैं, उनके साथ अभद्र व्यवहार करते हैं और हैरानी की बात ये है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में लगभग हर उम्र के पुरुष शामिल हैं.

गाजियाबाद में एक पत्रकार सिर्फ इसलिए मार दिया जाता है क्योंकि वो अपनी बहन और बेटियों को असामाजिक तत्वों से बचाने की कोशिश कर रहा था..ये घटना कानून व्यवस्था के साथ-साथ संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करती है.

रक्षाबंधन से पहले की ये घटना बहुत लोगों के दिल तोड़ने वाली है और हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हम ये कैसे देश का निर्माण कर रहे हैं? जिन लोगों ने ये हत्या की वो लगातार इस परिवार की बहन और बेटियों को परेशान कर रहे थे. लेकिन क्या इन आरोपियों की गिरफ्तारी से ही सारी बात खत्म हो जाती है? विक्रम जोशी की पत्नी का कहना है कि इन आरोपियों को चौराहे पर लटकाकर गोली मार देनी चाहिए और यही बात अपराधियों के खिलाफ हमारे देश की भी भावना बन चुकी है. इन हत्यारों के साथ क्या किया जाना चाहिए ये काम कानून का है. लेकिन आज देश के लोगों की उस भावना को भी समझने का दिन है जिसके तहत अपराधियों के एनकाउंटर पर तालियां बजाई जाती हैं. ये लोगों का गुस्सा है और लोग ऐसे अपराधियों के साथ इंस्टंट जस्टिस यानी तत्काल न्याय होते हुए देखना चाहते हैं.

पुलिस की भूमिका पर भी उठे सवाल 
आपको याद होगा कि इसी महीने की 10 तारीख को उत्तर प्रदेश पुलिस ने गैंगस्टर विकास दुबे को एक एनकाउंटर में मार दिया था. तब भी पूरे देश ने तालियां बजाई थीं और जब पिछले साल 6 दिसंबर को हैदराबाद पुलिस ने गैंगरेप के 4 आरोपियों का एनकाउंटर किया था. तब लोगों ने पुलिस वालों को कंधों पर उठा लिया था. लेकिन आज इस घटना में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं. जो परिवार लगातार पुलिस से रक्षा की गुहार लगा रहा था उसकी पुलिस ने एक नहीं सुनी और नतीजा आपके सामने है. इस मामले में लापरवाही बरतने के आरोप में एक पुलिस अधिकारी को सस्पेंड कर दिया गया है, आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है. लेकिन सवाल ये है कि क्या समय रहते इन अपराधियों के साथ न्याय हो पाएगा? कम से कम आंकड़े तो इसका समर्थन नहीं करते.

अपराधियों को सजा की दर सबसे कम
भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां अपराधियों को सजा मिलने की दर सबसे कम है. IPC के तहत आने वाले अपराधों में सजा मिलने की दर सिर्फ 40 प्रतिशत है और अगर मामला यौन उत्पीड़न का हो तो सजा मिलने की दर घटकर सिर्फ 18 प्रतिशत रह जाती है. और हैरानी की बात ये है कि भारत में सजा मिलने की दर लगातार घटती जा रही है. वर्ष 2016 में गंभीर अपराध के मामलों में सजा मिलने की दर 46 प्रतिशत थी जिसमें अब 5 से 6 प्रतिशत की कमी आ चुकी है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016 में गंभीर अपराधों के मामले में 5 लाख 96 हजार लोगों को सजा मिली थी, जबकि 6 लाख 78 हजार से ज्यादा लोग बरी हो गए थे.

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सुस्त न्याय प्रणाली
इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि हमारी न्याय प्रणाली पूरी दुनिया के मुकाबले बहुत सुस्त रफ्तार से काम करती है. भारत की अदालतों में इस समय साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित हैं. नवंबर 2019 तक के आंकड़ों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग केसे की संख्या करीब 54 हजार है. देश की अलग-अलग हाई कोर्ट्स में 44 लाख 75 हजार और निचली अदालतों में 3 करोड़ 14 लाख मामलों में कोई फैसला नहीं आया है.

कहा गया है कि जहां नारी की पूजा की जाती है, वहां देवता निवास करते हैं. हमारे देश में साल में दो बार नवरात्र में लोग कन्या पूजन करके ये दिखाते भी हैं कि उनके मन में महिलाओं के प्रति कितना सम्मान है. लेकिन ये सम्मान मन में ही दिखता है, बाहर नहीं. हमारे देश में ये स्थिति सिर्फ महिलाओं की नहीं है. यहां तक कि जो पुरुष महिलाओं की रक्षा करते हैं वो भी अपराधियों का शिकार हो जाते हैं.

क्या कहते हैं आंकड़े
वर्ष 2018 में हमारे देश में 29 हजार से ज्यादा लोगों की हत्या हुई थी यानी हर दिन करीब 80 हत्याएं और इनमें से ज्यादातर हत्याएं आपसी रंजिश और बदला लेने की भावना की वजह से होती हैं. एक आंकड़े के मुताबिक भारत में हर साल जितने लोग आतंकवाद में नहीं मारे जाते उससे 200 से 300 गुना लोग हत्या का शिकार हो जाते हैं. लेकिन फिर भी इस तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता.

अब आप सोचिए हमारे देश में ना महिलाएं सुरक्षित हैं और ना पुरुष और यहां तक कि एक अपराधी 8 पुलिसवालों की हत्या करके भी 7 दिनों तक भागता रहता है. अपराधी अक्सर जमानत या पेरोल पर बाहर आ जाते हैं फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है. यहां तक कि हमारे देश में लोग अपराधियों के मानव अधिकारों की तो बात करते हैं. लेकिन पीड़ितों के मानव अधिकारों की बात नहीं करते फिर चाहे पीड़ित एक महिला हो, कोई पुरुष हो या फिर पुलिस वाले हों. कल ही सुप्रीम कोर्ट ने विकास दुबे एनकाउंटर की जांच के लिए गठित कमेटी को एक हफ्ते में इस मामले की जांच शुरू करने के लिए कहा है. इस जांच कमेटी में सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज को भी शामिल किया गया है. लेकिन आप ये सोचिए कि किसी ने इस बात की जांच कराने के लिए कभी कोई दबाव क्यों नहीं डाला कि 60 मामलों में आरोपी होने के बावजूद विकास दुबे को बार-बार जमानत कैसे मिलती रही. 2019 में जब विकास दूबे इसी तरह जमानत पर जेल से बाहर आया था तो उसके समर्थकों ने नारे लगाए थे ‘जेल का ताला टूट गया, शेर हमारा छूट गया’. 

आखिर न्याय कब तक? 
हमारे देश में एक कुख्यात अपराधी के मारे जाने के बाद भी उसे न्याय दिलाने के लिए बुद्धिजीवी और मानवाधिकारों की बात करने वाले सक्रिय हो जाते हैं और अदालतें भी जांच कराने का आदेश दे देती हैं. आतंकवादियों की फांसी टालने के लिए आधी रात को सुप्रीम कोर्ट खुलवा लिया जाता है. लेकिन एक आम आदमी को न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं और कई बार तो पीड़ित न्याय का इंतजार करते करते ही मर जाता है और तब कोई कुछ नहीं बोलता. और आम आदमी के प्रति न्याय व्यवस्था का यही सुस्त रवैया देश की जनता के गुस्से का कारण बन जाता है और लोग तत्काल न्याय पर तालियां बजाने लगते हैं. हालांकि ये एक लोकतांत्रिक देश के लिए शुभ संकेत नहीं है. लेकिन इसके कारणों पर आज सिस्टम में बैठे लोगों को विचार करना चाहिए. इसी गुस्से को हमारी फिल्मों में भी कई बार दिखाया गया है. 

लेकिन ये विडंबना ही है कि हमारे देश में महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर बहुत सी फिल्में बनती हैं. इस विषय पर सेमिनार होते हैं. बड़ी-बड़ी कॉन्फ्रेंस होती हैं. लेकिन समाज की सोच में कोई बदलाव नहीं आता. लोग फिल्म देखने के बाद उसके टिकट फाड़ देते हैं. सेमिनार और कॉन्फ्रेंस में आंखें बंद करके दूसरे विचारों में खो जाते हैं और सब कुछ ऐसे ही चलता रहता है. हमें लगता है कि समाज और सिस्टम की इस दोहरी मानसिकता का अंत तुरंत होना चाहिए.

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