Book Review: दुनिया में कोरोना के खिलाफ सबकी लड़ाई एक जैसी, बता रही है किताब Pandemic 2020

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Book Review: दुनिया में कोरोना के खिलाफ सबकी लड़ाई एक जैसी, बता रही है किताब Pandemic 2020

लेखक यश तिवारी ने कोरोना वायरस पर आधारित उपन्यास पैनडेमिक 2020 लिखा है

नये कोरोना वायरस (Novel Coronavirus) पर आधारित पहला उपन्यास (First Novel) होने का दावा करने वाला उपन्यास ‘पैनडेमिक 2020’ (Pandemic 2020) छपकर आया है.

चीनी नगर वुहान (Wuhan) में पिछले साल के अंत में फैली एक महामारी (Pandemic) इतने बड़े स्तर पर पूरी दुनिया में फैल जायेगी, किसी को इसका अंदाजा नहीं था. तेजी से यह पूरी दुनिया में फैल गई. करोड़ों लोग इससे संक्रमित (infected) हो गये. लाखों लोगों की इसके चलते मौत हो गई. हमें भी समझ आया कि कई महीनों तक हमें इससे जूझना होगा और कुछ चीजें ‘न्यू नॉर्मल’ (new normal) बनकर सालों हमारे साथ रहेंगीं. फिर भी मानव के अदम्य साहस पर भरोसा करने वाले लोगों का मानना था कि एक वैक्सीन (vaccine) हमें इस पर जीत दिला देगी. लेकिन वैश्विक स्वास्थ्य की अग्रणी संस्था WHO की ओर से आये नये बयानों ने इस उम्मीद को भी धुंधला किया है. संस्था ने आशंका जताई है कि वैक्सीन भी कोई जादुई कारनामा करेगी निश्चित नहीं है और कई सालों तक हमें इस जानलेवा वायरस (deadly virus) से जूझना पड़ सकता है.

यानी तय हो चुका है कि यह कोरोना वायरस (Coronavirus) कई शताब्दियों में सामने आने वाली भयानक महामारी जैसा है. जो न सिर्फ हमारी जीवन शैली में कई बदलाव करेगा है बल्कि इससे व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों ही स्तर पर लोगों के जीवन पर बहुत असर होगा. ऐसे में इस असर को तमाम अलग-अलग माध्यमों में दर्ज भी किया जा रहा है ताकि सनद रहे. लेखों और वीडियोज की शक्ल में यह न्यूज रिपोर्ट्स (News Reports) में अखबारों और डिजिटल जगत पर साक्ष्य बनकर तो रहेगा ही लेकिन यह टीवी सीरियल, फिल्मों और उपन्यासों में भी अपनी तरह से दर्ज किया जा रहा है. इसी क्रम में नये कोरोना वायरस (Novel Coronavirus) पर आधारित पहला उपन्यास होने का दावा करने वाला उपन्यास ‘पैनडेमिक 2020’ (Pandemic 2020) छपकर आया है. यह उपन्यास अपने विषय के साथ ही इसलिए भी खास है क्योंकि इसे लिखा है सिर्फ 18 साल के यश तिवारी (Yash Tiwari) ने. और उनका यह पहला उपन्यास भी नहीं है, इससे पहले उनका उपन्यास ‘ए सेलिब्रेशन इन (ट्रिब्यूलेशन’ A Celebration in Tribulation) दो साल पहले ही प्रकाशित हो चुका है.

दुनिया के चार अलग-अलग देशों में कोरोना से लड़ते लोगों की कहानी
होनहार लेखक ने इस वैश्विक महामारी का वैश्विक चित्र खींचने की कोशिश अपने उपन्यास में की है. इसलिए इसमें जहां एक वाकया चीन के वुहान का है, तो दूसरा इटली के मिलान का, तीसरा अमेरिका के न्यूयॉर्क का और चौथा भारत के मुंबई का. जैसा कि महामारी के दौरान सामने आया कि महामारी का सिर्फ लोगों के स्वास्थ्य पर ही प्रभाव नहीं पड़ा बल्कि इससे आर्थिक दुष्परिणाम, सामाजिक भेदभाव, नस्लवाद और अफवाह की घटनाओं की भी बाढ़ सी आ गई. महामारी के इन सारे पक्षों को यश ने अपने उपन्यास में पिरोने का बखूबी प्रयास किया है. इस उपन्यास में आपको कोरोना वायरस से जूझते परिवारों और लोगों की पीड़ा और दुर्दशा का अंदाजा भी होगा और इससे उपजे सामाजिक बहिष्कार और नस्लभेद की झलक भी मिलेगी. एक ओर ऐसा किसी अफ्रीकी अमेरिकी के साथ हो रहा होगा, तो वहीं दूसरी ओर ऐसा एक भारत में रहने वाली नेपाली मूल की नागरिक के साथ.दुनिया भर के स्वास्थ्यकर्मियों के समर्पण का डॉक्यूमेंटेशन

यश ने लोगों की जिजीविषा और वायरस के अज्ञात खतरे को अच्छी तरह से उपन्यास में रखा है. उन्होंने किसी आदर्श और सुखद दिलासे के पीछे न भागते हुए बहुत ही यथार्थपूर्ण पक्ष को सामने रखना चाहा है, इसलिए उनके उपन्यास में वायरस ही मनुष्यों पर हावी होता दिखता है. यानी किताब के अंदर की दुनिया, बाहर की दुनिया से ज्यादा अलग नहीं है. हालांकि तमाम व्यक्तिगत दुखों और डर के बाद भी लोग एक दूसरे के साथ हैं और डॉक्टर-नर्सें और स्वास्थ्य कर्मचारी इस आपदा में मोर्चे पर डटे हुए हैं. वे भले ही ईश्वर न साबित हुए हों लेकिन यह तय है कि वे आशा के उस पत्ते की तरह हैं, जो इस महामारी की नदी में बह रही चींटी जैसी दुनिया को सहारा देकर पार लगा सकते हैं.

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पूरी दुनिया में महामारी से निपटने के दौरान एक सूत्र तलाशती किताब
‘पैनडेमिक 2020’ नाम का यह उपन्यास महामारी से संघर्ष करती मानवता के शुरुआती चित्रणों में से एक है. अभी हमारे सामने बहुत से अच्छे-बुरे मंजर आने हैं. दुनिया को अभी बहुत कुछ सीखना और समझना है लेकिन अपनों के लिए सबकुछ न्यौछावर करने का, प्रेम का और जीवन-मौत के चक्र का जो संदेश इस उपन्यास में छिपा है वह शाश्वत है. इस उपन्यास को अलग-अलग देशों में लोगों की अपनों को बचाने की एक जैसी लड़ाई को समझने के लिए पढ़ा जाना चाहिए. कहीं-कहीं पर कथा के कुछ बनावटी होते जाने का एहसास हो सकता है लेकिन यश का अपनी उम्र के मुकाबले यह बहुत परिपक्व प्रयास है.​

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