वैक्सीन की रेस जीतने के चक्कर में कहीं जल्दबाजी तो नहीं कर रहा रूस!

News Nation

नई दिल्ली: रूस ने कोरोना वायरस के खिलाफ वैक्सीन खोज ली है लेकिन एक्सपर्ट्स कुछ और कह रहे हैं. आईसीएमआर के पूर्व निदेशक का दावा है कि अगर मैं रेगुलेटर होता तो भारत में कभी रूस के दावे वाली इस वैक्सीन की एंट्री न होने देता.

दरअसल, उस एक सवाल का जवाब जो दुनिया का हर इंसान ढूंढ रहा है. उसका जवाब रूस ने दिया कि कोरोना की वैक्सीन तैयार हो गई और जल्दी ही रूस इसे बाजार में बेचेगा. जल्दी मतलब अक्टूबर में. वैक्सीन बनाने में जुटे सभी देश अच्छी तरह ये जानते हैं कि जो पहली वैक्सीन का दावा करेगा, बाजार पर कब्जा उसी का होगा. इसलिए इस रेस में अव्वल आना ही सबसे अहम माना गया.

रूस के पास रेस में पहले रहने की दो बड़ी वजहे हैं. रूस के राष्ट्रपति पुतिन पर कोरोना की महामारी से लड़ने में नाकाम रहने के आरोप लग रहे हैं.

जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के आंकड़ों के मुताबिक रूस में कोरोना से 8 लाख 95 हजार लोग संक्रमित हैं और बुधवार तक  15 हजार 100 मौतें हो चुकी हैं. ऐसे में वैक्सीन लाने का दावा करना डैमेज कंट्रोल की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

दूसरी वजह स्वाभाविक है, कोरोना के बाजार पर कब्जा करना.

लेकिन इस रेस में जीतने के चक्कर में कहीं कोई जल्दबाजी तो नहीं हो गई.

तीसरा और सबसे अहम चरण बाकी
रूस में बन रही वैक्सीन के दो चरणों के क्लीनिकल ट्रायल महज 2 महीने में पूरे हो गए. और अभी तीसरा और सबसे अहम चरण बाकी है. सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि तीसरे चरण के बिना वैक्सीन की घोषणा कैसे की जा सकती है.

इस चरण में ये देखा जाता है कि जब वैक्सीन लगे व्यक्ति का वायरस से सामना होता है तब ये कितना बचाव करती है. यानी वैक्सीन असल में कितनी असरदार है. इस चरण तक पहुंचते पहुंचते साइड इफेक्ट का अंदाजा भी लगाया जाता है.

रूस अभी इस चरण में पहुंचा ही नहीं है. और अक्टूबर में वैक्सीन बाजार में लाने की घोषणा भी हो गई. आईसीएमआर के पूर्व निदेशक एन के गांगुली के मुताबिक कोई विकसित देश इस वैक्सीन को स्वीकार नहीं करेगा. क्योंकि इसके असर को अभी ठीक से रूस में नहीं समझा गया है.

कोई भी साइंटिफिक डाटा जारी ही नहीं किया
एम्स में वैक्सीन ट्रायल के प्रमुख डॉ. संजय राय कहते हैं, ‘आप इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि भारत में बन रही कोवैक्सीन के पहले चरण में एक महीने तक मरीज को मॉनिटर किया जाएगा. तब पहला चरण पूरा होगा. वैक्सीन के ट्रायल का पहला चरण जुलाई के दूसरे हफ्ते में भारत में शुरू हुआ है. पहला चरण ठीक जा रहा है – बाकी के दो फेज को पूरा करने में भी इतना वक्त और लगेगा. यानी केवल प्रक्रिया का वक्त ही तीन महीने तक का होता है. चाहे कितनी भी तेजी से काम क्यों न हो रहा हो. भारत बहुत दूर नहीं है लेकिन जल्दबाजी बिल्कुल नहीं कर रहा है.’

भारत में वैक्सीन पर काम कर रही एम्स की टीम के प्रमुख डॉ. संजय राय के मुताबिक रूस की वैक्सीन पर इस स्टेज में तो भरोसा किया ही नहीं जा सकता. जिस स्टेज में रूस की वैक्सीन है उस स्टेज में तो कई और वैक्सीन भी पहुंच चुकी हैं लेकिन किसी ने ऐसा दावा नहीं किया कि हम बाजार के लिए तैयार हैं. इसीलिए वैक्सीन को लेकर रूस के इन दावों पर कई देश संदेह जता रहे हैं.

ब्रिटेन और अमेरिका समेत कई देशों के विशेषज्ञ इस वैक्सीन की सुरक्षा और असर पर सवाल उठा रहे हैं. ब्रिटेन ने तो रूस की इस वैक्सीन का इस्तेमाल करने से ही साफ इनकार कर दिया है. असल में इसकी वजह ये है कि रूस ने इस वैक्सीन के परीक्षण से संबंधित कोई भी साइंटिफिक डाटा जारी ही नहीं किया है.किसी वैक्सीन को जारी करने से पहले उसके रिसर्च पेपर विशेषज्ञों से साझा किये जाते हैं. जर्नल में रिसर्च प्रकाशित होती है उसका आकलन होता है. जाहिर है रूस ने ऐसा कुछ नहीं किया है.

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