भारत की राफेल यात्रा में अहम भूमिका निभाने वाले हिलाल अहमद

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अनंतनाग: रफाल (rafale) विमान के साथ हिलाल अहमद राथर (Hilal Ahmed Rather) की भी इन दिनों जमकर चर्चा हो रही है. हिलाल अहमद फ्रांस में भारत के air attache हैं. उन्होंने रफाल विमानों को भारतीय जरूरतों के अनुरूप ढालने में अहम भूमिका निभाई. मीडिया में हिलाल अहमद राथर को मिल रही कवरेज से उनका परिवार बेहद खुश है और इसे हिलाल के प्रति लोगों का प्यार बता रहे हैं. 

अनंतनाग के रहने वाले हैं हिलाल अहमद राथर
हिलाल अहमद राथर जम्मू कश्मीर के अनंतनाग जिले के रहने वाले हैं. उनके बहनोई डॉ. मोहम्मद अयूब मट्टू ने कहा कि हिलाल के पिता  मोहम्मद अब्दुल्ला राथर भी जम्मू और कश्मीर में भारतीय सेना की लाइट इन्फेंट्री का हिस्सा थे. उन्होंने वर्ष 1962 में लद्दाख में चीन के खिलाफ युद्ध लड़ा था और एक पिकेट को फतह किया. इस पिकेट को फिर राथर पिकेट नाम दे दिया गया. 

पिता ने देखा था हिलाल के वायुसेना अफसर बनने का सपना
मट्टू ने कहा कि उनके पिता का सपना था कि हिलाल भारतीय वायुसेना में अफसर बने. उनकी मां ने हिलाल के जन्म से एक दिन पहले ईद के चांद का सपना देखा. उनके जन्म के बाद उसके पिता ने उनका नाम हिलाल रखा.हिलाल का मतलब चांद होता है.  मट्टू ने कहा कि उनके पिता हिलाल की तरह जोश से भरे थे. यदि आज वह जीवित होते तो बेटे की सफलता को देखकर खुश होते.

पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं हिलाल
अयूब मट्टू ने कहा कि एयर कमोडोर हिलाल पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे हैं. हिलाल ने शुरुआत पड़ाई अनंतनाग से की. उसके बाद उन्होंने सैनिक स्कूल नगरोटा में दाखिला लिया. बाद में वे एनडीए पुणे में चयनित हो गए. उस समय पास आउट के दौरान भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ने उन्हें सोर्ड ऑफ ऑनर दिया गया था. यह सम्मान पाने वाले वे दक्षिण कश्मीर के पहले नागरिक थे. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 

हिलाल इस समय फ्रांस में भारत के air attache हैं. उन्हें 1988 में एयरफोर्स में कमीशन किया गया था. फ्लाइट लेफ्टिनेंट बनने से लेकर अब एयर कमोडोर बनने तक उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. उन्हें मिग 21, मिराज -2000, और किरण विमानों पर 3000 घंटे से अधिक की दुर्घटना-मुक्त उड़ान का अनुभव है. वर्ष 2010 में विंग कमांडर के रूप में बेहतरीन सेवा कार्यों के लिए उन्हें वायु सेना पदक मिल चुका है. 

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