इश्क़ का इख़्तिताम करते हैं, पढ़ें वज़ीर अली ‘सबा’ लखनवी की शायरी

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वज़ीर अली ‘सबा’ लखनवी की शायरी (Wazir Ali Saba Lakhnavi Shayari) : उर्दू के मशहूर शायर वज़ीर अली ‘सबा’ लखनवी का वास्तविक नाम मीर वज़ीर अली था. हैदराबाद के हैदर अली आतिश उनके गुरु थे. उन्हें ”सबा’ तखल्लुस मिला था. वह नवाबों के शहर लखनऊ के तीसरी पीढ़ी के प्रमुख शायरों से से एक थे. वज़ीर अली ‘सबा’ लखनवी ख़्वाजा ‘आतिश’ के लाइक़ शागिर्द थे. आज हम आपके लिए कविताकोश के साभार से वज़ीर अली ‘सबा’ लखनवी के कुछ प्रमुख शायरियां लेकर आए हैं..

दिल साफ हुआ आईना-ए-रू नज़र आया…

दिल साफ हुआ आईना-ए-रू नज़र आया
सब कुछ नज़र आया जो हमें तू नज़र आयाहूरों की तरफ़ लाख हो ज़ाहिद की तवज्जोह

खुल जाएँगी आँखें जो कभी तू नज़र आया

बे-ताबी-ए-दिल ने बग़ल-ए-गोर झुकाई
आराम न हरग़िज किसी पहलू नज़र आया

मै-कश मुझ साक़ी के नज़ारे ने बनाया

बिजली सी कमर अब्र सा गेसू नज़र आया

जो बात है हर मज़हब ओ मिल्लत से जुदा है
देखा तो ‘सबा’ सब से अलग तू नज़र आया.

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ये उलझ पड़ने की ख़ू अच्छी नहीं…

ये उलझ पड़ने की ख़ू अच्छी नहीं
बे-मुहाबा गुफ़्तगू अच्छी नहीं.

मार डाला इश्तियाक़-ए-यार ने
इस क़दर भी आरज़ू अच्छी नहीं

झुक के मिल सब से ब-रंग-ए-शाख़-ए-गुल
सरकशी ऐ सर्व-ए-जू अच्छी नहीं

ख़ाना-ए-दिल की है रौनक़ इश्क़ से
ज़िंदगी बे-आरज़ू अच्छी नहीं

सख़्त बातों का तेरी क्या दें जवाब
बहस होनी दू-ब-दू अच्छी नहीं

तुझ से बेहतर है अँधेरी क़ब्र की
ऐ शब-ए-ग़म ख़ाक तू अच्छी नहीं

ऐ ‘सबा’ आवारगी से हाथ उठा
ख़ाक उड़ानी कू-बा-कू अच्छी नहीं.

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इश्क़ का इख़्तिताम करते हैं…

इश्क़ का इख़्तिताम करते हैं
दिल का क़िस्सा तमाम करते हैं

क़हर है क़त्ल-ए-आम करते हैं
तुर्क तुर्की तमाम करते हैं

ताक़-ए-अब्र से उन के दर गुज़रे
हम यहीं से सलाम करते हैं

शैख़ उस से पनाह माँगते हैं
बरहमन राम राम करते हैं

जौहरी पर तेरे दुर-ए-दंदाँ
आब ओ दाना हराम करते हैं

या इलाही हलाल हों वाइज़
दुख़्त-ए-रज़ को हराम करते हैं

आप के मुँह लगी है दुख़्तर-ए-रज़
बातें होंटों से जाम करते हैं

क़ाबिल-ए-गुफ़्तुगू रक़ीब नहीं
आप किस से कलाम करते हैं

रात भर मेरे नाला-ए-पुर-दर्द
नींद उन की हराम करते हैं

ऐ ‘सबा’ क्यूँ किसी का दिल तोड़ें
काबे का एहतिराम करते हैं.

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